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देश में लॉकडाउन का शुक्रवार को तीसरा दिन है। काम-धंधा सब ठप हो गया है। पेट पालने के लिए शहर आए मजदूरों के पास अब वहां रुकने की कोई वजह नहीं बची। बस-ट्रेन सब बंद है। मजबूरी में मजदूर परिवार के साथ पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने गांवों के लिए रवाना हो चुके हैं। दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर ऐसे ही हजारों लोग पैदल अपने गांवों की ओर जाते हुए नजर आए।

मजदूर बोले- कोरोना से नहीं तो भूख से मर जाएंगे

यूपी की ज्यादातर सड़कों पर ऐसे मजदूरों के जत्थे देखने को मिल जाएंगे। पैसे नहीं हैं, खाना नहीं है। पेट पालने के लिए शहर आए थे और भूखे ही गांव वापस लौटना पड़ रहा है। इन हालात से कोई अनजान नहीं है। संक्रमण का खतरा बरकरार है, लेकिन इंसानियत के नाते पुलिस और प्रशासन इन जरूरतमंदों की मदद के लिए हर जरूरी कोशिश कर रहे हैं। रास्ते में ऐसे मजदूरों को खाना खिलाया जा रहा है। संक्रमण से बचने के लिए मास्क दिए जा रहे हैं और साथ ही समझाया भी जा रहा है कि आपका ये सफर आपके अपनों को ही मुश्किल में डाल देगा। लेकिन, सैकड़ों किलोमीटर के सफर पर निकले ये मजदूर कहते हैं कि हम कोरोना से शायद बच भी जाएं, लेकिन भुखमरी से जरूर मर जाएंगे। इन लोगों के पैरों में छाले पड़ गए हैं, पर ये रुक नहीं रहे... चलते जा रहे हैं अपने गांवों की ओर।

इलाहाबाद के एक मित्र किसी पारिवारिक आयोजन में मार्च के दूसरे हफ्ते में गाजियाबाद गए थे। इसी दौरान पहले ‘जनता कर्फ्यू’ का सामना करना पड़ा। उससे वह खुश भी थे। लगा, वक्त की जरूरत है और ऐसे संदेश इसी तरह दिए भी जा सकते हैं। खुद भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। शाम पांच बजे घंटा भी बजाया, शंख भी। लेकिन शाम होते-होते पहले कुछ घंटे और फिर कुछ दिन के लिए जनता कर्फ्यू का एक्स्टेंशन, और दो दिनों बाद ही पूरे देश में 21 दिनों का लॉकडाउन... बेचारे पत्नी और बेटी के साथ गाजियाबाद में बेटे की ससुराल में फंस गए हैं। वापसी का कोई रास्ता नहीं दिख रहा। कोई सुनने वाला नहीं मिल रहा।

वह अकेले शख्स नहीं हैं। ऐसे तमाम लोग हैं जो किसी कार्यवश बाहर गए और अब जहां-तहां फंस गए हैं। वाराणसी की एक लड़की लखनऊ में काम करती है। पीजी हॉस्टल में रहती है। जनता कर्फ्यू और लॉकडाउन के पहले दौर तक तो सब ठीक था। ‘वर्क फ्राॅम होम’ कर रही थी। पढ़ाई करने वाली बच्चियां तो काॅलेज बंद होने के कारण घर चली गईं। यह लॉकडाउन में ‘वर्क फ्राॅम होम’ की सुविधा के साथ यहीं रह गई। अब 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा होने और कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए पीजी वालों ने उसे घर जाने को कह दिया है। वे अब तक तो नाश्ता-खाना दे रहे हैं, लेकिन अब आनाकानी भी हो रही है। कुल मिलाकर उसे जैसे भी घर चले जाने का संकेत है। दोस्त और परिवार के लोग उसके वापस बनारस जाने का इंतजाम कर रहे हैं।

कोरोना संकट और लॉकडाउन को लेकर सरकार ने तमाम एडवाइजरी जारी की हैं। उनमें वह सब कुछ है जो रोजमर्रा के लिए जरूरी है लेकिन बहुत कुछ है जिसे एड्रेस ही नहीं किया गया। ऐसा नहीं कि नियम और एडवाइजरी बनाने वालों को इन दिक्कतों का अहसास ही नहीं है। उन्हें बखूबी पता है कि ये दिक्कतें आएंगी। बस, वे एड्रेस नहीं करना चाहते। ऐसे ही इंतजामों में अगली पंक्ति में रहने वाले एक अफसर की मानें तो ऐसे प्रावधान इसलिए भी नहीं रखते अफसर, कि उन्हें ऊपर वाले की फटकार का भय रहता है।

फिर भी, लगता है कि कुछ तो ऐसा होना चाहिए था जो बताता कि ऐसी मुसीबत के मारे, दूसरे शहरों में फंसे लोग आखिर ऐसे वक्त में कहां संपर्क करें, किससे मदद मांगें? यह सवाल सोशल मीडिया पर भी जेरे बहस है कि इस अत्यंत जरूरी पहल पर कोई तवज्जो ही नहीं दी गई। ऐसे दौर में जब हमारी बहुत बड़ी आबादी होस्टल, मेस, कैंटीन और पीजी के भरोसे हो, दैनिक मजदूरी करने के लिए दूर-दराज से आए लाखों-करोड़ों लोग बिना किसी स्थायी ठीहे के रह रहे हों, अचानक इस लॉकडाउन ने उन्हें दर-बदर कर दिया है।

वे जहां हैं, वहां उनके लिए न काम रहा न ठौर। ऐसे में, इन या उन जैसे लोगों को सुरक्षित वापस उनके घोसले तक पहुंचाने की जिम्मेदारी इसी तंत्र की थी। इसी तंत्र को यह भी सुनिश्चित करना था कि किसी मजबूरी में दूसरे शहरों में फंस गए लोगों की कोई सुनता और उनकी वापसी का सुरक्षित रास्ता देता।

भूखों के लिए कराया भोजन का इंतजाम
कोरोना के खतरे के बीच भूखों के लिए पुलिस भोजन भी उपलब्ध करा रही है। इस कार्य में पुलिस के साथ जीआरपी और आरपीएफ के जवान भी लगे हैं। प्रयागराज जोन के एडीजी प्रेम प्रकाश अपने घर पर ही हलवाई बुलाकर भोजन के पैकेट तैयार करवा रहे हैं। इसी तरह सिविल लाइंस पुलिस स्टेशन में तैनात पुलिसकर्मियों ने जरूरतमंदों के लिए भोजन के पैकेट तैयार कर बांटे।

साहब हमें खाना दिलाइए
देश में तमाम लोग रोड किनारे झोपड़ी बनाकर रहते हैं। लॉकडाउन के चलते उन्हें मजदूरी भी नहीं मिल रही है। बच्चे भूख से व्याकुल हो रहे हैं। बरेली में कई परिवार खाने की मांग को लेकर एसएसपी दफ्त पहुंच गए। लेकिन, वहां मिले पुलिसकर्मियों ने परिवारों को डीएम के यहां जाने की बात कहकर भेज दिया। सभी विकास भवन के पास जाकर बैठ गए। बाद में कुछ लोगों ने उनके खाने पीने का इंतजाम कराया। लेकिन, यहां प्रशासन को अभी राहत के लिए बहुत कुछ करना बाकी है।

मालगाड़ी के खाली रैक में आ रहे लोग
लॉकडाउन के बीच लोग घर पहुंचने के लिए कई तरीके अपना रहे हैं। कानपुर में गुरुवार रात ऐसे कई लोगों को मालगाड़ी से उतारा गया जो चोरी छिपे उत्तर प्रदेश आ रहे थे। स्टेशन पर महाराष्ट्र के नासिक से चढ़े करीब 200 व्यक्तियों को उतारकर उनकी चेकिंग की गई। उनके हाथों पर 14 दिन तक घर में क्वारैंटाइन रहने की मुहर लगी थी।